कहाँ हो भावी भारत के कर्णधार तुम TRP के भूखे पत्रकार? तुम्हारी नजर यहाँ क्यूँ नही गई? एक तरफ़ यहाँ सैकडों निर्दोषों की जान का खूनी खेल खेला जा रहा है और वहां पाकिस्तान में उल्टा हम पर दोष लगाया जा रहा है की ये सब हमने नाटक किया है ॥
अत्यन्त शर्मनाक॥
एक बार ये पूरा विडियो जरूर देखिये की कैसे पाकिस्तानी मीडिया हमारे खिलाफ जहर उगल रहा है।
क्या ऐसी बातों का विरोध सरकार की तरफ़ से नही होना चाहिए?? सोचिये ....
समय हो तो बाकी के विडियो भी देखियेगा॥
१-
२-
३-
Tuesday, December 2, 2008
Saturday, November 29, 2008
बैठे दिल्ली में नपुंसक साले....
बात शुरू करने से पहले मेरा नमन उन वीरों को जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना देश को आतंकियों के एक सफल प्रयास को समय की सीमाओं में बाँधने में देश की मदद की।
मैंने सफल शब्द का उपयोग इसलिए किया क्यूंकि आतंकियों की असफलता केवल एक है की वो 5000 का सोच के आए थे और ३०० से संतोष करना पड़ा। इसके अलावा हर एक मुकाम पर वो सफल ही कहे जायेंगे। आखिरकार बहुत आसानी से उन्होंने हम सबको हमारी सुरक्षा व्यवस्था की औकात दिखा दी. अभी अभी नई ख़बर आना शुरू हुई है की लगभग सभी सुरक्षा समितियों को बहुत हद तक इस हमले की सटीक ख़बर दी जा चुकी थी पर उसके बाद भी हम किसी भी मुकाम पर आतंकियों को नही रोक पाये, इसके लिए हम सभी वाकई बधाई के पात्र हैं।
ब्लॉग जगत पर पिछले ३ दिन में हजारों पंक्तियाँ ,कवितायें और विचार वैसे भी दिए ही जा चुके हैं। हमको इसके अलावा आता ही क्या है। बस भाषण दिलवा दीजिये की अब हम चुप नही बैठेंगे, हमको आगे बढ़ना होगा, उनको जवाब देना होगा, हम दुनिया को दिखा देंगे, हमको मत ललकारो। बस यहाँ लिखा, और जाके रजाई ओढ़ के सो गए। हो गया अपना काम। अभी भी पता नही किस ललकार की जरूरत है समझ नई आता और ललकार मिल भी गई तो उनको दिखाने के लिए हमारे पास कौन सा तरीका है ये भी पल्ले नही पड़ता॥
कुछ लोगों ने अलबत्ता बहुत अच्छा लिखा। समय हो तो शमा जी का लेख यहाँ से जरूर पढिये।
पूरे ३ दिन देश ने न केवल पूरी आतंकी घटना का सीधा प्रसारण देखा बल्कि साथ साथ हमारे - - - - नेताओं की आपस की भों भों भी। - - - की जगह जिसे जो बुरा से बुरा आता हो भरने के लिए स्वतंत्र है क्यूंकि ये जात ही ऐसी है। किसी को शर्म नही आई। ये केवन इन नपुंसकों की वोट की राजनीति का ही नतीजा है कि कभी दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर कुछ कर ही नही सकते। काश ये सब निर्दोषों के ऊपर होने से अच्छा इन अकर्मण्य नेताओं के ऊपर हुआ होता तो कुछ तसल्ली जरूर होती कि शायद अब कुछ बदलाव आए। पर इनको क्या है, मरने वाले मरते रहेंगे। शर्मनाक बात ये कि जब ख़ुद इनकी सुरक्षा की बात आती है तो जिस पुलिस के भरोसे पूरा देश छोड़ा हुआ है, उस पर ख़ुद इन बेशर्मों को ही भरोसा नही होता।
किसी ब्लॉग में एक कविता पढ़ी थी।
वो निहत्थों पे वार करते हैं.
रोज़ ताज़ा शिकार करते हैं.
बैठे दिल्ली में नपुंसक साले,
देश को शर्मशार करते हैं.
पूरी ग़ज़ल यहाँ से पढ़ें -
अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी ही। कोशिश करूँगा अपना गुस्सा यहाँ जल्दी जल्दी निकालता रहूँ... आपके कमेंट्स का इन्तजार रहेगा..
मैंने सफल शब्द का उपयोग इसलिए किया क्यूंकि आतंकियों की असफलता केवल एक है की वो 5000 का सोच के आए थे और ३०० से संतोष करना पड़ा। इसके अलावा हर एक मुकाम पर वो सफल ही कहे जायेंगे। आखिरकार बहुत आसानी से उन्होंने हम सबको हमारी सुरक्षा व्यवस्था की औकात दिखा दी. अभी अभी नई ख़बर आना शुरू हुई है की लगभग सभी सुरक्षा समितियों को बहुत हद तक इस हमले की सटीक ख़बर दी जा चुकी थी पर उसके बाद भी हम किसी भी मुकाम पर आतंकियों को नही रोक पाये, इसके लिए हम सभी वाकई बधाई के पात्र हैं।
ब्लॉग जगत पर पिछले ३ दिन में हजारों पंक्तियाँ ,कवितायें और विचार वैसे भी दिए ही जा चुके हैं। हमको इसके अलावा आता ही क्या है। बस भाषण दिलवा दीजिये की अब हम चुप नही बैठेंगे, हमको आगे बढ़ना होगा, उनको जवाब देना होगा, हम दुनिया को दिखा देंगे, हमको मत ललकारो। बस यहाँ लिखा, और जाके रजाई ओढ़ के सो गए। हो गया अपना काम। अभी भी पता नही किस ललकार की जरूरत है समझ नई आता और ललकार मिल भी गई तो उनको दिखाने के लिए हमारे पास कौन सा तरीका है ये भी पल्ले नही पड़ता॥
कुछ लोगों ने अलबत्ता बहुत अच्छा लिखा। समय हो तो शमा जी का लेख यहाँ से जरूर पढिये।
पूरे ३ दिन देश ने न केवल पूरी आतंकी घटना का सीधा प्रसारण देखा बल्कि साथ साथ हमारे - - - - नेताओं की आपस की भों भों भी। - - - की जगह जिसे जो बुरा से बुरा आता हो भरने के लिए स्वतंत्र है क्यूंकि ये जात ही ऐसी है। किसी को शर्म नही आई। ये केवन इन नपुंसकों की वोट की राजनीति का ही नतीजा है कि कभी दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर कुछ कर ही नही सकते। काश ये सब निर्दोषों के ऊपर होने से अच्छा इन अकर्मण्य नेताओं के ऊपर हुआ होता तो कुछ तसल्ली जरूर होती कि शायद अब कुछ बदलाव आए। पर इनको क्या है, मरने वाले मरते रहेंगे। शर्मनाक बात ये कि जब ख़ुद इनकी सुरक्षा की बात आती है तो जिस पुलिस के भरोसे पूरा देश छोड़ा हुआ है, उस पर ख़ुद इन बेशर्मों को ही भरोसा नही होता।
किसी ब्लॉग में एक कविता पढ़ी थी।
वो निहत्थों पे वार करते हैं.
रोज़ ताज़ा शिकार करते हैं.
बैठे दिल्ली में नपुंसक साले,
देश को शर्मशार करते हैं.
पूरी ग़ज़ल यहाँ से पढ़ें -
अब बात निकली है तो दूर तलक जायेगी ही। कोशिश करूँगा अपना गुस्सा यहाँ जल्दी जल्दी निकालता रहूँ... आपके कमेंट्स का इन्तजार रहेगा..
Thursday, October 23, 2008
एक नजर इधर भी - MNS - मून नवनिर्माण सेना
Tuesday, October 21, 2008
अब चंदा मामा पास के, हम पुए पकाएं आस के...
और हमने ये कर दिखाया।
आज जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] द्वारा विकसित राकेट पीएसएलवी सी 11 सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह छह बजकर 22 मिनट पर रवाना हुआ और इसी रवानगी के साथ एक नए दौर की शुरुआत भी हुई। किसी भी भारतीय के लिए चाँद कभी भी सिर्फ़ पृथ्वी का एक मात्र उपग्रह नही रहा है। हमने जब से होश संभाला हमेशा चाँद को अपने बहुत करीब पाया। भारत में चाँद को मामा कहा गया। बच्चों को उनकी माओं ने हमेशा से ये लोरी सुना के सुलाया - चंदा मामा दूर के॥ चाहे वो ईद का चाँद हो या पूर्णिमा का, हमेशा हमने उसे हँसता हुआ मुस्कुराता हुआ पाया। अमावस्या को जब मामा जी नही आए तो सबने एक दूसरे से जरूर पूछा की क्या आज अमावस्या है? और आज हमारा अपना यान भारत के करोड़ों लोगों की शुभकामनाओं के साथ लाखों बच्चों के मामा के पास जा रहा है...
आइये अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें उन चुनिन्दा वैज्ञानिकों को जिनके अथक प्रयास से ये उपलब्धि सम्भव हो पाई है..
सबसे पहले तो सभी देशवासियों को बहुत बहुत बधाई, आखिरकार हम भी चाँद पर अपने देश का झंडा फहराने की कूबत रखने वाले देशों की जमात में शामिल हो ही गए। वैसे अभी कुछ समय लगेगा हमारा तिरंगा चंदा मामा तक पहुँचने में पर एक अच्छी और सफल शुरुआत के बाद हम सब कुछ अच्छा होने की ही आशा कर सकते हैं...
आज जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] द्वारा विकसित राकेट पीएसएलवी सी 11 सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह छह बजकर 22 मिनट पर रवाना हुआ और इसी रवानगी के साथ एक नए दौर की शुरुआत भी हुई। किसी भी भारतीय के लिए चाँद कभी भी सिर्फ़ पृथ्वी का एक मात्र उपग्रह नही रहा है। हमने जब से होश संभाला हमेशा चाँद को अपने बहुत करीब पाया। भारत में चाँद को मामा कहा गया। बच्चों को उनकी माओं ने हमेशा से ये लोरी सुना के सुलाया - चंदा मामा दूर के॥ चाहे वो ईद का चाँद हो या पूर्णिमा का, हमेशा हमने उसे हँसता हुआ मुस्कुराता हुआ पाया। अमावस्या को जब मामा जी नही आए तो सबने एक दूसरे से जरूर पूछा की क्या आज अमावस्या है? और आज हमारा अपना यान भारत के करोड़ों लोगों की शुभकामनाओं के साथ लाखों बच्चों के मामा के पास जा रहा है...
आइये अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें उन चुनिन्दा वैज्ञानिकों को जिनके अथक प्रयास से ये उपलब्धि सम्भव हो पाई है..
Wednesday, July 23, 2008
संसद या हस्तिनापुर का दरबार??

22 जुलाई को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में जो भी हुआ उसके बारे में कुछ भी लिखते समय अन्दर से शर्म ही महसूस होती है। जब संसद में नोट उछाले जा रहे थे तब हम अपने काम के सिलसिले में चंडीगढ़ से दिल्ली का सफर बस से कर रहे थे। हमारे छोटे भाई लगातार फ़ोन से संसद का आंखों देखा हाल बयां कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने बताया नोटों की गड्डियों का किस्सा, हमारे मुंह से ओह ओह निकल गया, अगल बगल के यात्री भी देखने लग गये, पर शरम के मारे उनसे कुछ बता भी नही पाया। उसके बाद जो भी कुछ होता गया, हम सुनते रहे।
आज चिट्ठाजगत पर पुराने लेख देखते समय श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' जी की कविता -"घिन आने लगी है 'घोड़ामण्डी' से" देखी, जिन्होंने ना पढ पाई हो वो यहां से पढ़ सकते हैं। बहुत अच्छा चित्रण किया है कल और आज के नेताओं का। कुछ पंक्तियां तोबहुत ही प्रभावी हैं -
चिलचिलाती धूप में
पसीने से लथपथ ..
आते थे जब भी ..
भटकते हुए मांग कर
किसी से 'लिफ्ट'
अथवा पैदल ...
तुम्हारा भूखा प्यासा
पदयात्रा से थका चेहरा
कर देता था व्याकुल
हर गावं में मां को ..
दौड़ पड़ती थी बहना
ले पानी का गिलास
भाभी टांक देती थी बहुधा
तुम्हारे ‘फटे हुए कुरते’ के बटन
बाबा सोचते थे हरबार
देने को एक नया कुरता
मुझसे पहले ….. तुम्हें
किंतु ......
जबसे देखता हूँ तुम्हें…
पहने हुए तरह तरह के मुखौटे
बदलते हुए टोपियाँ …. हरपल
निकलते हुए कार से
गावं के उस मिटटी के चबूतरे का
उडाते हुए उपहास .....
साथ ही याद आ गई बचपन में एक कवि सम्मेलन में सुनी ये चार पक्तियां -
जिनके हाथों में सरकार है,
उनका संदिग्ध किरदार है,
आप कहते हैं संसद जिसे,
हस्तिनापुर का दरबार है।
सत्य को झूठ लिखता रहा...
राजधानी का अखबार है॥
कवि के नाम पर बहुत पक्का नही हूं, कोशिश करूंगा कि पूरी कविता हाथ लग पाये, शायद अंसार कम्बरी जी ने सुनाई थी। अगर गलत हो तो सही करवा दिजियेगा।
Sunday, July 6, 2008
आरुषि केस का सच...
पिछले करीब डेढ़ महीने से कमोबेश सभी टीवी चैनलों की शोभा बने रहने के बाद और अभी भी चार लोगों के बीच बहस का एक मुद्दा बने रहने के बाद भी जब ये केस सुलझने का नाम ही नही ले रहा था तो हमने भी सोचा की चलो हम ही अपनी अकल लगाते हैं और इस केस के तह तक पहुँचने की कोशिश करते हैं.. खैर, एक बारगी पूरे केस का सिंहावलोकन करने के बाद इस दोहरे हत्याकांड के सूत्रधार महोदय (अथवा महोदया) को तो हम भी चिन्हित नही कर पाए, पर एक बात तो मैं भी कहूँगा की इस केस से एक बहुत बड़ा सच जरूर आ गया पूरे देश और दुनिया के सामने, और वो ये की हमारे देश की सर्वोच्च जाँच पड़ताल संस्था (सीबीआई) के बस का शायद अब कुछ भी नही है..
पहले जब भी किसी नेता के ऊपर सीबीआई जांच बैठाई जाती थी तो कुछ उम्मीद रहती थी की शायद ये केस सुलझेगा, पर धीरे धीरे देश ने ये स्वीकार कर लिया कि नेताओं को सजा दिलवा पाना सीबीआई क्या किसी के लिए भी असंभव है. पर अब जब नेताओं क्या आम जनता के केस भी नही सुलझ पा रहे हैं तो ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता एवं कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है.
अब आते हैं आरुषि केस पर. एक घर के अन्दर एक रात २ लोगों का कत्ल हो जाता है. उस घर से जुड़े जितने भी लोग हैं उन सभी पे शक किया जाता है. और सबसे पहली गिरफ्तारी होती है आरुषि के पिता यानि की डा. तलवार की. उनकी गिरफ्तारी तक का काम किया गया विश्व प्रसिद्द यू पी पुलिस के द्वारा जिन्होंने केस को पूरी तरह सुलझाने का मीडिया के सामने बहुत अच्छे से दावा किया, साथ ही बिना किसी संकोच के आरुषि और हेमराज के संबंधों पर भी दावे कर दिए. खैर, अपेक्षित राजनीति के बाद ये केस सोंप दिया गया सीबीआई को. और उस दिन से आज तक सीबीआई की बदौलत आम आदमी नारको टेस्ट, लाई डिटेक्शन टेस्ट और भी न जाने क्या क्या टेस्टों के बारे में जान गया है. पर केस का पूर्ण सत्य आना अभी भी अपेक्षित है. प्रतिदिन टीवी देखते या अखबार पढ़ते समय ये नही पता होता की अब आज किसके ऊपर कातिल होने का सहरा बंधने वाला है.
खैर, कातिल कोई भी हो पर ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है की ये बात सभी को पता है की ये दोनों कत्ल किसी सोची समझी रणनीति की तहत नही किए गए. जितने भी लोग शक के घेरे में हैं उनमें से किसी ने भी शायद कागज कलम लेके कत्ल करने की रणनीति नही बनाई होगी. जो कुछ भी हुआ उसके पीछे केवल त्वरित उन्माद था. पर डेढ़ महीने की कवायद के बाद भी केस ना सुलझ पाना केवल और केवल ये बताता है की आजकल कितना आसान हो गया है किसी केस से बचना. डा. तलवार अभी भी जेल में हैं. यद्यपि सीबीआई ने उनको क्लीन चिट नही दी हेई पर अगर सच आने के बाद वो निर्दोष साबित होते हैं तो ये सोचने की बात है की जिन केसों की सीबीआई जांच नही होती उनमें कितने ही डा. तलवार भारत की जेलों में बंद होंगे. जिन केसों पर मीडिया इतना मेहरबान नही होता, सीबीआई जांच नही बैठाई जाती, उन केसों में कितने ही निर्दोष लोग ऐसे ही जेल की हवा खा जाते होंगे. और डा. तलवार, कृष्णा, राजकुमार या जो भी हो, देश की सर्वोच्च जांच संस्था को आसानी से गच्चा दे सकते हैं...
हम तो बस उम्मीद ही कर सकते हैं की जो सच में कातिल हो उसे ही सजा मिले और जरूर मिले. पर ऐसी नाकामी पर पुलिस और सीबीआई दोनों को चिंतन जरूर करना चाहिए...
पहले जब भी किसी नेता के ऊपर सीबीआई जांच बैठाई जाती थी तो कुछ उम्मीद रहती थी की शायद ये केस सुलझेगा, पर धीरे धीरे देश ने ये स्वीकार कर लिया कि नेताओं को सजा दिलवा पाना सीबीआई क्या किसी के लिए भी असंभव है. पर अब जब नेताओं क्या आम जनता के केस भी नही सुलझ पा रहे हैं तो ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता एवं कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है.
अब आते हैं आरुषि केस पर. एक घर के अन्दर एक रात २ लोगों का कत्ल हो जाता है. उस घर से जुड़े जितने भी लोग हैं उन सभी पे शक किया जाता है. और सबसे पहली गिरफ्तारी होती है आरुषि के पिता यानि की डा. तलवार की. उनकी गिरफ्तारी तक का काम किया गया विश्व प्रसिद्द यू पी पुलिस के द्वारा जिन्होंने केस को पूरी तरह सुलझाने का मीडिया के सामने बहुत अच्छे से दावा किया, साथ ही बिना किसी संकोच के आरुषि और हेमराज के संबंधों पर भी दावे कर दिए. खैर, अपेक्षित राजनीति के बाद ये केस सोंप दिया गया सीबीआई को. और उस दिन से आज तक सीबीआई की बदौलत आम आदमी नारको टेस्ट, लाई डिटेक्शन टेस्ट और भी न जाने क्या क्या टेस्टों के बारे में जान गया है. पर केस का पूर्ण सत्य आना अभी भी अपेक्षित है. प्रतिदिन टीवी देखते या अखबार पढ़ते समय ये नही पता होता की अब आज किसके ऊपर कातिल होने का सहरा बंधने वाला है.
खैर, कातिल कोई भी हो पर ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है की ये बात सभी को पता है की ये दोनों कत्ल किसी सोची समझी रणनीति की तहत नही किए गए. जितने भी लोग शक के घेरे में हैं उनमें से किसी ने भी शायद कागज कलम लेके कत्ल करने की रणनीति नही बनाई होगी. जो कुछ भी हुआ उसके पीछे केवल त्वरित उन्माद था. पर डेढ़ महीने की कवायद के बाद भी केस ना सुलझ पाना केवल और केवल ये बताता है की आजकल कितना आसान हो गया है किसी केस से बचना. डा. तलवार अभी भी जेल में हैं. यद्यपि सीबीआई ने उनको क्लीन चिट नही दी हेई पर अगर सच आने के बाद वो निर्दोष साबित होते हैं तो ये सोचने की बात है की जिन केसों की सीबीआई जांच नही होती उनमें कितने ही डा. तलवार भारत की जेलों में बंद होंगे. जिन केसों पर मीडिया इतना मेहरबान नही होता, सीबीआई जांच नही बैठाई जाती, उन केसों में कितने ही निर्दोष लोग ऐसे ही जेल की हवा खा जाते होंगे. और डा. तलवार, कृष्णा, राजकुमार या जो भी हो, देश की सर्वोच्च जांच संस्था को आसानी से गच्चा दे सकते हैं...
हम तो बस उम्मीद ही कर सकते हैं की जो सच में कातिल हो उसे ही सजा मिले और जरूर मिले. पर ऐसी नाकामी पर पुलिस और सीबीआई दोनों को चिंतन जरूर करना चाहिए...
Monday, June 16, 2008
दुनिया का नारा... लगे रहो
आज जैसे ही "साप्ताहिक फोरवर्ड ई-मेल सफ़ाई अभियान" - अपुन की आदत है कि हफ्ते भर के जितने फोरवर्ड मेल आते हैं उनका निपटारा रविवार को किया जाता है कि किसे रखना है और किसे हमेशा के लिए अलविदा करना है - शुरू ही किया था कि सबसे पहली मेल पर ही मन उदास हो गया। मेल का शीर्षक था - Outstanding Journlism -- Breaking News These Days, शायद आप सभी ने ये मेल या समाचार देखे भी हों। बस मन में आया कि चलो ब्लॉग पर भी चस्पा कर दिया जाए। आजकल हमारे ब्लॉग जगत में कुछ प्रसिद्ध पत्रकारों का जमावड़ा रहता है तो उम्मीद यही है कि शायद उनमें से कोई तो आगे आयेगा जिनके लिए TRP रेटिंग से जादा अंतरतम की आवाज़ महत्वपूर्ण होगी...










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