Tuesday, October 21, 2008

अब चंदा मामा पास के, हम पुए पकाएं आस के...

और हमने ये कर दिखाया।

सबसे पहले तो सभी देशवासियों को बहुत बहुत बधाई, आखिरकार हम भी चाँद पर अपने देश का झंडा फहराने की कूबत रखने वाले देशों की जमात में शामिल हो ही गए। वैसे अभी कुछ समय लगेगा हमारा तिरंगा चंदा मामा तक पहुँचने में पर एक अच्छी और सफल शुरुआत के बाद हम सब कुछ अच्छा होने की ही आशा कर सकते हैं...



आज
जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] द्वारा विकसित राकेट पीएसएलवी सी 11 सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह छह बजकर 22 मिनट पर रवाना हुआ और इसी रवानगी के साथ एक नए दौर की शुरुआत भी हुई। किसी भी भारतीय के लिए चाँद कभी भी सिर्फ़ पृथ्वी का एक मात्र उपग्रह नही रहा है। हमने जब से होश संभाला हमेशा चाँद को अपने बहुत करीब पाया। भारत में चाँद को मामा कहा गया। बच्चों को उनकी माओं ने हमेशा से ये लोरी सुना के सुलाया - चंदा मामा दूर के॥ चाहे वो ईद का चाँद हो या पूर्णिमा का, हमेशा हमने उसे हँसता हुआ मुस्कुराता हुआ पाया। अमावस्या को जब मामा जी नही आए तो सबने एक दूसरे से जरूर पूछा की क्या आज अमावस्या है? और आज हमारा अपना यान भारत के करोड़ों लोगों की शुभकामनाओं के साथ लाखों बच्चों के मामा के पास जा रहा है...

आइये
अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें उन चुनिन्दा वैज्ञानिकों को जिनके अथक प्रयास से ये उपलब्धि सम्भव हो पाई है..

Wednesday, July 23, 2008

संसद या हस्तिनापुर का दरबार??


22 जुलाई को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में जो भी हुआ उसके बारे में कुछ भी लिखते समय अन्दर से शर्म ही महसूस होती है। जब संसद में नोट उछाले जा रहे थे तब हम अपने काम के सिलसिले में चंडीगढ़ से दिल्ली का सफर बस से कर रहे थे। हमारे छोटे भाई लगातार फ़ोन से संसद का आंखों देखा हाल बयां कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने बताया नोटों की गड्डियों का किस्सा, हमारे मुंह से ओह ओह निकल गया, अगल बगल के यात्री भी देखने लग गये, पर शरम के मारे उनसे कुछ बता भी नही पाया। उसके बाद जो भी कुछ होता गया, हम सुनते रहे।

आज चिट्ठाजगत पर पुराने लेख देखते समय श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' जी की कविता -"घिन आने लगी है 'घोड़ामण्डी' से" देखी, जिन्होंने ना पढ पाई हो वो यहां से पढ़ सकते हैं। बहुत अच्छा चित्रण किया है कल और आज के नेताओं का। कुछ पंक्तियां तोबहुत ही प्रभावी हैं -

चिलचिलाती धूप में
पसीने से लथपथ ..
आते थे जब भी ..
भटकते हुए मांग कर
किसी से 'लिफ्ट'
अथवा पैदल ...

तुम्हारा भूखा प्यासा
पदयात्रा से थका चेहरा
कर देता था व्याकुल
हर गावं में मां को ..
दौड़ पड़ती थी बहना
ले पानी का गिलास
भाभी टांक देती थी बहुधा
तुम्हारे ‘फटे हुए कुरते’ के बटन
बाबा सोचते थे हरबार
देने को एक नया कुरता
मुझसे पहले ….. तुम्हें

किंतु ......
जबसे देखता हूँ तुम्हें…
पहने हुए तरह तरह के मुखौटे
बदलते हुए टोपियाँ …. हरपल
निकलते हुए कार से
गावं के उस मिटटी के चबूतरे का
उडाते हुए उपहास .....

साथ ही याद आ गई बचपन में एक कवि सम्मेलन में सुनी ये चार पक्तियां -

जिनके हाथों में सरकार है,
उनका संदिग्ध किरदार है,
आप कहते हैं संसद जिसे,
हस्तिनापुर का दरबार है।
सत्य को झूठ लिखता रहा...
राजधानी का अखबार है॥

कवि के नाम पर बहुत पक्का नही हूं, कोशिश करूंगा कि पूरी कविता हाथ लग पाये, शायद अंसार कम्बरी जी ने सुनाई थी। अगर गलत हो तो सही करवा दिजियेगा।

Sunday, July 6, 2008

आरुषि केस का सच...

पिछले करीब डेढ़ महीने से कमोबेश सभी टीवी चैनलों की शोभा बने रहने के बाद और अभी भी चार लोगों के बीच बहस का एक मुद्दा बने रहने के बाद भी जब ये केस सुलझने का नाम ही नही ले रहा था तो हमने भी सोचा की चलो हम ही अपनी अकल लगाते हैं और इस केस के तह तक पहुँचने की कोशिश करते हैं.. खैर, एक बारगी पूरे केस का सिंहावलोकन करने के बाद इस दोहरे हत्याकांड के सूत्रधार महोदय (अथवा महोदया) को तो हम भी चिन्हित नही कर पाए, पर एक बात तो मैं भी कहूँगा की इस केस से एक बहुत बड़ा सच जरूर आ गया पूरे देश और दुनिया के सामने, और वो ये की हमारे देश की सर्वोच्च जाँच पड़ताल संस्था (सीबीआई) के बस का शायद अब कुछ भी नही है..
पहले जब भी किसी नेता के ऊपर सीबीआई जांच बैठाई जाती थी तो कुछ उम्मीद रहती थी की शायद ये केस सुलझेगा, पर धीरे धीरे देश ने ये स्वीकार कर लिया कि नेताओं को सजा दिलवा पाना सीबीआई क्या किसी के लिए भी असंभव है. पर अब जब नेताओं क्या आम जनता के केस भी नही सुलझ पा रहे हैं तो ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता एवं कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है.
अब आते हैं आरुषि केस पर. एक घर के अन्दर एक रात २ लोगों का कत्ल हो जाता है. उस घर से जुड़े जितने भी लोग हैं उन सभी पे शक किया जाता है. और सबसे पहली गिरफ्तारी होती है आरुषि के पिता यानि की डा. तलवार की. उनकी गिरफ्तारी तक का काम किया गया विश्व प्रसिद्द यू पी पुलिस के द्वारा जिन्होंने केस को पूरी तरह सुलझाने का मीडिया के सामने बहुत अच्छे से दावा किया, साथ ही बिना किसी संकोच के आरुषि और हेमराज के संबंधों पर भी दावे कर दिए. खैर, अपेक्षित राजनीति के बाद ये केस सोंप दिया गया सीबीआई को. और उस दिन से आज तक सीबीआई की बदौलत आम आदमी नारको टेस्ट, लाई डिटेक्शन टेस्ट और भी न जाने क्या क्या टेस्टों के बारे में जान गया है. पर केस का पूर्ण सत्य आना अभी भी अपेक्षित है. प्रतिदिन टीवी देखते या अखबार पढ़ते समय ये नही पता होता की अब आज किसके ऊपर कातिल होने का सहरा बंधने वाला है.
खैर, कातिल कोई भी हो पर ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है की ये बात सभी को पता है की ये दोनों कत्ल किसी सोची समझी रणनीति की तहत नही किए गए. जितने भी लोग शक के घेरे में हैं उनमें से किसी ने भी शायद कागज कलम लेके कत्ल करने की रणनीति नही बनाई होगी. जो कुछ भी हुआ उसके पीछे केवल त्वरित उन्माद था. पर डेढ़ महीने की कवायद के बाद भी केस ना सुलझ पाना केवल और केवल ये बताता है की आजकल कितना आसान हो गया है किसी केस से बचना. डा. तलवार अभी भी जेल में हैं. यद्यपि सीबीआई ने उनको क्लीन चिट नही दी हेई पर अगर सच आने के बाद वो निर्दोष साबित होते हैं तो ये सोचने की बात है की जिन केसों की सीबीआई जांच नही होती उनमें कितने ही डा. तलवार भारत की जेलों में बंद होंगे. जिन केसों पर मीडिया इतना मेहरबान नही होता, सीबीआई जांच नही बैठाई जाती, उन केसों में कितने ही निर्दोष लोग ऐसे ही जेल की हवा खा जाते होंगे. और डा. तलवार, कृष्णा, राजकुमार या जो भी हो, देश की सर्वोच्च जांच संस्था को आसानी से गच्चा दे सकते हैं...

हम तो बस उम्मीद ही कर सकते हैं की जो सच में कातिल हो उसे ही सजा मिले और जरूर मिले. पर ऐसी नाकामी पर पुलिस और सीबीआई दोनों को चिंतन जरूर करना चाहिए...

Monday, June 16, 2008

दुनिया का नारा... लगे रहो

आज जैसे ही "साप्ताहिक फोरवर्ड ई-मेल सफ़ाई अभियान" - अपुन की आदत है कि हफ्ते भर के जितने फोरवर्ड मेल आते हैं उनका निपटारा रविवार को किया जाता है कि किसे रखना है और किसे हमेशा के लिए अलविदा करना है - शुरू ही किया था कि सबसे पहली मेल पर ही मन उदास हो गया। मेल का शीर्षक था - Outstanding Journlism -- Breaking News These Days, शायद आप सभी ने ये मेल या समाचार देखे भी हों। बस मन में आया कि चलो ब्लॉग पर भी चस्पा कर दिया जाए। आजकल हमारे ब्लॉग जगत में कुछ प्रसिद्ध पत्रकारों का जमावड़ा रहता है तो उम्मीद यही है कि शायद उनमें से कोई तो आगे आयेगा जिनके लिए TRP रेटिंग से जादा अंतरतम की आवाज़ महत्वपूर्ण होगी...






Friday, May 30, 2008

चंडीगढ़ - चंडी माता का घर

अभी अचानक बैठे बैठे ख्याल आया की क्यों न आज कुछ लिख ही दिया जाए अपने ब्लॉग पर। हमारे संजीत भाई पता नही कब से कह कह के हार गए की कुछ तो लिखो पर हम भी ठहरे आलसी नम्बर एक। पर चलिए, देर आए दुरुस्त आए। फ़िर सोचा गया की क्या लिखा जाए और दिल ने तुरंत ही जवाब दिया। कि क्यों न लिखा जाए उस शहर के ऊपर जिसकी खूबसूरती ने पिछले 4 महीने से हमारे दिल और दिमाग पर ऐसा असर किया हुआ है कि हम दिल वालों के शहर दिल्ली को ही भुला बैठे हैं।
ऑफिस के काम से कुछ चार महीने पहले अचानक चंडीगढ़ जाने का आदेश मिला। तब ये अंदाजा नही था कि ये भ्रमण चार महीने तक खिच जाएगा। खैर जो भी हुआ अच्छा हुआ। इसी बहाने ये ब्लॉग लिखने और ऐसे अद्वितीय शहर को घूमने का मौका मिला। चलिए तो बात करते हैं चंडीगढ़ के इतिहास से-chandigarh city official logo
चंडीगढ़ भारत के उन चुनिंदा शहरों में से एक है जिनको आज़ादी के बाद एक तयशुदा डिजाइन के तहत बसाया गया है। आज़ादी के बाद पंजाब प्रान्त भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित हो गया। उसके पहले पंजाब की राजधानी लाहौर हुआ करती थी। विभाजन के बाद लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा हो गया। तब ये चर्चा शुरू हुई की पंजाब के किस शहर को यहाँ की राजधानी बनाया जाए । बहुत जद्दोजहद के बाद भी किसी एक शहर पर पूर्ण सहमति नही बन पाई। तभी एक विचार प्रमुखता से पंडित नेहरू के सामने लाया गया की क्यों न एक नया शहर बसाया जाए। एक ऐसा शहर जो पूरी तरह से नए भारत की पहचान हो। और इस तरह नींव पड़ी चंडीगढ़ की। जगह चुनी गई हिमालय के प्रथम सोपान हिमांचल प्रदेश और मैदानी क्षेत्र के आखिरी पड़ाव के बीच की। और नाम चुना गया चंडी माता के ऊपर - चंडीगढ़ - अर्थात चंडी माता का गढ़ (किला). पूरा प्लान बनने के लिए बुलाया गया अमेरिका के प्रसिद्ध वास्तुकार अल्बर्ट मयेर को। उनके बाद काम संभाला आज के चंडीगढ़ के डिजायनर के नाम से पहचाने जाने वाले लुई कर्बुजिये ने। इन दोनों ने बहुत मेहनत और सभी पहलुओं को ध्यान में रख के चंडीगढ़ की डिजाइन तैयार की। और इस तरह ये भव्य शहर बन के तैयार हुआ॥
आज चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा प्रदेश की राजधानी होने के साथ साथ एक केन्द्र शाषित प्रदेश भी है। चंडीगढ़ पहुँचने पर जो पहली बात आपके मन में आएगी वो ये की भाई वाह, क्या सड़कें हैं, क्या पार्किंग है और क्याroads in chandigarh बिल्डिंग्स हैं। दिल्ली मुम्बई के ट्रैफिक का अनुभव कर चुके लोग तो एक बारगी भरोसा ही नही करेंगे की इतना जादा स्मूथ ट्रैफिक भी हो सकता है क्या? पूरा शहर एक प्लान के तहत बनाया गया है। कहाँ बाज़ार होने चाहिए, कहाँ बस स्टैंड, कहाँ आवासीय इलाका तो कहाँ स्कूल। आपके सामने होगी एक मेन रोड, उसके दोनों तरफ़ पैदल और साईकिल के लिए लेन, उसके बाद इफरात पार्किंग और फ़िर उसके बाद कोई घर या भवन॥

एक बार बस आप आ जाइये उसके बाद ख़ुद ही यहाँ की खूबसूरती में ऐसे खो जायेंगे की क्या कहा जाए। अरे हाँ, एक बात और। जो यहाँ आके आप जरूर मानेंगे। और वो है यहाँ के लोगों की खूबसूरती। जितने दिल से जिंदादिल उतने ही दिखने में सुंदर। हमारे साथ हमारे एक मित्र भी आए थे और वो भी सुदूर दक्षिण यानि केरल से। उनके मुंह से जो पहली बात निकली वो ये की "यार ये लोग अपनी लड़कियों को खिलाते क्या हैं?"। अब आप समझ ही गए होंगे की इस शहर की बात ही कुछ ख़ास है। तो अब देर कैसी। बस बना ही डालिए प्लान ऐसी खूबसूरत जगह को घूमने का। चंडीगढ़ में बहुत सी जगह घूमने के लिए हैं। जैसे रॉक गार्डन, रोज़ गार्डन, सुखना लेक, म्यूजियम, सेक्टर १७ का मार्केट, चंडी माता का मन्दिर, पिन्जोर गार्डन, मंशा देवी का मन्दिर। इनके बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा। अभी के लिए इतना ही.